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Saturday, August 30, 2014

Our Cultural Heritage - हमें जिन पर नाज़ है - Saadat Hasan Manto


सआदत हसन मंटो उर्दू साहित्य में एक ऐसा नाम है, जिन्होंने न केवल अपनी कलम की ताकत से समाज में व्याप्त विसंगतियों को उकेरा, बल्क़ि उन्होंने तथाकथित समाज के ठेकेदारों की धार्मिक उन्माद्ता से घायल होती इंसानियत को, हैवानियत की शिकार बनती औरत को, सरहदों और बंटवारे के दर्द को, बिना लाग लपेट के, जस का तस आईने में पेश कर के बेबाक बानगी की मिसाल कायम की।

मंटो के अफ़साने, कहानियाँ अथवा नाटक आज भी समसामयिक से प्रतीत होते हैं. जब भी कहीं दंगे होते हैं तो मंटो के ज़ख्म फिर से हरे होते जान पड़ते हैं और उनकी कलम से लहूलुहान रूह का स्वर मुखरित हो कर मानों चीखता चिल्लाता हुआ कहता है --- हाँ मैं – मंटो-- आज भी ज़िन्दा हूँ—दंगो के दर्द से –आज़ाद-- होना चाहता हूँ. काश मंटो के दर्द के अहसास को समाज समझ पाता !!!!!

मंटो की रचना में अश्लीलता के आरोप लगा कर उन पर कई मुकदमें भी चले मगर प्रमाण न मिलने के कारण उन्हें सफलता ही मिली।  यदि मंटो का दृष्टिकोण अश्लील होता तो उनकी क़लम टोबा टेक सिंह, ख़ुदा की क़सम, मम्मी, काली शलवार, ये मर्द ये औरतें, रत्ती माशा तोला, ठंडा गोश्त, सियाह हाशिए, नंगी आवाज़े, बू, खोल दो और लाइसेंस जैसी बेहतरीन कहानियाँ न रच पाती।  इस बारे में मण्टो ने स्वयं कहा है कि – “ ज़माने के जिस दौर से हम गुज़र रहे हैं अगर आप उससे वाकिफ़ नहीं तो मेरे अफ़साने पढ़िए और अगर आप इन अफ़सानों को बरदाश्त नहीं कर सकते तो इसका मतलब है कि ज़माना नाक़ाबिले बरदाश्त है, मेरी तहरीर में कोई नुक्स नहीं. जिस नुक्स को मेरे नाम से मनसूब किया जाता है वह दरअसल मौजूदा निज़ाम का नुक्स है.

 मैं अफ़साना नहीं लिखता, हक़ीकत यह है कि अफ़साना मुझे लिखता है. मैं बहुत कम पढ़ा लिखा आदमी हूँ. यूँ तो मैंने 20 से ऊपर क़िताबें लिखी हैं , लेकिन मुझे कभी – कभी हैरत होती है कि यह कौन है जिसने इस क़दर अच्छे अफ़साने लिखे हैं , जिन पर आए दिन मुक़दमे चलते रहते हैं.--

–जब क़लम मेरे हाथ में न हो तो मैं सिरफ़ सआदत हसन होता हूँ , जिसे उर्दू आती है न फ़ारसी , न अंग्रेजी , न फ़्रांसीसी---.”

मंटो का जन्म 11 मई 1912 को समराला, पंजाब में पुश्तैनी बैरिस्टर कश्मीरी मुस्लिम परिवार में हुआ था. अपने 42 साल 8 महीने के जीवन में मंटो ने 230 कहानियाँ, 67 रेडियो नाटक तथा लगभग 70 लेख इत्यादि लिखे.

मंटो ने जनवरी 1941 से जुलाई 1942 तक मुम्बई नगरी छोड़कर आल इंडिया रेडियो दिल्ली में बतौर स्क्रिप्ट राइटर के रूप में ज्वाइन किया।
हालांकि यहाँ वे सिर्फ़ 17 महीने ही रहें पर यह उनकी रचनाधर्मिता का स्वर्णकाल था. इस दौरान उनके नाटकों के चार संग्रह प्रकाशित हुए –“ आओ-- ” , “मंटो के ड्रामे” “जनाज़े” तथा “तीन औरतें”. आओ सीरीज़ के अंतर्गत चार रेडियो नाटक चयनित किए गए--- आओ चोरी करें , आओ कहानी लिखें, आओ ताश खेलें, आओ बात तो सुनो.

हालांकि बँटवारे के बाद 1948 में, मंटो मुम्बई से पाकिस्तान चले गए , मगर पाकिस्तान जाने के बाद मंटो मुम्बई की याद में अक्सर कहा करते थे –“ मेरी – वहाँ मेरी शादी हुई.--उनकी दोस्ती होने का मुझे गर्व है !---वहाँ मेरे मित्र भी थे ! बम्बई छोड़ने का मुझे भारी दुःख है–मैंने वहाँ हजारों लाखों रुपये कमाए और फूँक दिए--

-–दिन की शुरुआत भी वहीं की–--पहली संतान भी वहीं हुई–--बम्बई को मैं जी जान से चाहता था और आज भी चाहता हूँ---’’ 18 जनवरी 1955 को पाकिस्तान के लाहोर शहर मे मंटो ने अपने जीवन को अलविदा कह दिया. मगर उनके अफ़साने क्या कभी अलविदा कह पाएँगे----????????

Contributed by :- Alok Kumar Singh alokairdelhi@gmail.com

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