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Tuesday, August 2, 2016

रचना: साहित्य और फिल्म के फलक पर मोती, बी.ए. !


वाकई जो दिल के बहुत क़रीब होते हैं ,वो ही यादों के झरोखों में बीते हुए लमहों को याद रख पाते हैं ।आकाशवाणी की सेवा में रहते हुए अनगिनत महान व्यक्तियों के निकट आने का ,उनको सुनने और निकट से महसूस करने का अवसर मिला ।ऐसे ही एक संगीतमय व्यक्ति भोजपुरी के शलाका पुरुष थे स्व.मोती बी.ए. ।पूरा नाम मोतीलाल उपाध्याय ।देवरिया के बरेजी गांव में पहली अगस्त 1919को जन्में मोती जी को सुनना और इनकी सदाशयता को महसूस करना मुझ जैसे तमाम लोगों के हिस्से आया। 23जनवरी 2009 को उनकी एक ख़ामोश मौत ने उन्हें हम सबसे लौकिक रुप में भले ही दूर कर दिया है लेकिन आज भी स्मृतियों के वातायन से उनकी याद हम सबके मन मंदिर में मोती की तरह झिलमिलाती रहती है । पूर्वी उ.प्र. जो किन्हीं दिनों अपनी अशिक्षा,बीमारी,आपराधिक हिंसक गतिविधियों के लिए अक्सर चर्चा में हुआ करता था उन्हीं दिनों अपनी कुछ महान विभूतियों के कारण लोगों के आकर्षण का केन्द्रबिन्दु भी बना रहा है । उसी धरती पर हठयोगी बाबा गोरखनाथ जी की धूनी रमती रही है,बाबा राघव दास की कर्मभूमि रही है,देवरहा बाबा के अदभुत व्यक्तित्व के चमत्कार होते रहे हैं,एक साधारण रेलवे कर्मचारी के अलीनगर,गोरखपुर स्थित घर में एक संत की बालक्रीणाएं होती रही हैं जिसे आगे चलकर स्वामी योगानन्द के नाम से जाना गया,गीताप्रेस के सस्ते और सुलभ प्रकाशन पूरे विश्व को अपनी ओर खींचते रहे हैं,गीता वाटिका के विस्मयकारी संत राधा बाबा की कर्मभूमि रही है ,ज़मीन से जुड़े प्रेमचंद अपनी कहानियों का ताना बाना बुनते रहे हैं तो शायरी में अपना मुकाम बनाने को कटिबद्ध रघुपति सहाय फिराक़ रहे हैं,कुश्ती और मल्लविद्या में पूरे भारत में ब्रम्हदेव पहलवान डंका बजा रहे थे .....

कुछ ऐसे शख़्श, कुछ ऐसी वज़हें भी सामने आती रही हैं जिनसे वहां के लोग इतराने और मुस्कुराने की वज़ह भी पा जाया करते थे ।लोग अपना सीना तान कर कहा करते थे कि सांस्कृतिक दृष्टि से उर्वर इस भूमि पर वे भी विकास पथ पर चलने को उतावले हैं ।इन्हीं दिनों में आजादी के पूर्व के कालखंड में शिक्षा,साहित्य और फिल्मी फलक पर मोती,बी.ए.भी उभर रहे थे और अपनी उपस्थिति से यह एहसास करा रहे थे कि गन्ने की मिठास की अनुभूति साहित्य में भी हो सकती है ।उनकी एम.ए.तक की शिक्षा वाराणसी में पूरी हुई।लेकिन बी0ए0करते करते वे मंच के लोकप्रिय कवि बन गये ।इनका मंचीय नाम मोती बी.ए.इनकी पहचान के रुप में जो एक बार जुड़ा वह अंत तक उनके साथ रहा ।उनके साहित्य जीवन पर फिल्मों का भी रंग चढ़ा और उन्होंने हिन्दी और भोजपुरी की लगभग पचास फिल्मों में गीत लिखे ।उधर महाकवि शेक्सपियर के सानेट्स और महाकवि कालिदास के मेघदूत का पद्यानुवाद क्रमश:हिन्दी और भोजपुरी में करके साहित्य जगत में इन्होंने अपनी धमाकेदार उपस्थिति से सबको चौंका दिया था ।इतना ही नहीं "रश्क-ए-गुहर" और "दर्द -ए- गुहर" नाम से इनकी गज़लों तथा नज़्मों का संग्रह भी आया । 1948-49में पहली बार इन्होंने भोजपुरी के गीत "नदिया के पार"फिल्म में लिखे जो दिलीप कुमार और कामिनी कौशल अभिनीत फिल्म थी ।इसके गीत "कठवा के नइया बनइहे मल्लहवा,नदिया के पार दे उतार.. ," "अंखियां मिला के अंखिया,रोवें दिन रतिया..","दिल लेके भागा,दगा देके भागा,कैसे बेदर्दी से दिल मोरा लागा" ,"मोरे राजा हो,ले चल नदिया के पार.."आदि बेहद लोकप्रिय हुए ।उन दिनों भोजपुरी अपने अस्तित्व के लिए सांस्कृतिक संघर्ष के दौर से गुजर रही थी और इस संघर्ष के एकमात्र नायक मोती जी थे ।"स्क्रीन"नवम्बर 1983 अंक में दक्षिण भारत से सम्बन्ध रखने वाले प्रख्यात लेखक एल.के.रंगाराव ने इस तथ्य को स्वीकार किया कि मोती बी.ए.नेही फिल्मी दुनियां में भोजपुरी का प्रथम बीजारोपण किया ।इसी के बाद दिलीप कुमार के मन में "गंगा जमुना"बनाने की बात आई ।इसी क्रम में मोती जी नेअमर आस्था,पूर्णिमा,अमर नाथ,मिर्जा मुशर्रफ,राजपूत,ठकुराइन,चम्पा चमेली,ममता,भक्त ध्रुव,राम वन,कैसे कहूं,गजब भइलें रामा,आदि फिल्मों में गीत लिखे ।1952में वे मुम्बई से वापस आकर देवरिया के श्रीकृष्ण इंटर कालेज में प्रवक्ता हो गये और मंचीय कवि सम्मेलन,दूरदर्शन और आकाशवाणी के कार्यक्रमों में सक्रिय हो गये ।आकाशवाणी गोरखपुर की कार्यक्रम सलाहकार समिति के सदस्य भी रहे ।हिन्दी,अंग्रेजी,ऊर्दू और भोजपुरी में समान अधिकार रखने वाले इस साहित्य योद्धा के जीवन के अंतिम दिन बहुत अच्छे नहीं बीते ।लगभग एक साल तक वाणी भी अवरुद्ध रही ।इनकी लिखी लगभग बीस पुस्तकें हैं जो नौ खंडों में "मोती बी.ए.ग्रन्थावली"नामक संग्रह में संकलित हैं जिनका संपादन प्रोफेसर रामदेव शुक्ल ने किया है ।उनकी सुकंठित आवाज़ में उनका लोकप्रिय गीत आज भी आकाशवाणी गोरखपुर के स्टूडियो में गूंजता रहता है;
"अंसो आइल महुआबारी में बहार सजनी...
कोंचवा मातल भुइयां छूए,
महुआ रसे रसे चूए,
जबसे बहे भिनुसारे के बयार सजनी...
अंसो आइल महुआबारी में बहार सजनी !"
महुआ की मादक सुगंध की तरह मोती बी.ए.की रचनाएं जब तक साहित्य रस धरती पर है अपना प्रभाव बिखेरती रहेंगी ।उनको अपना साहित्य गुरु मानने वाले आकाशवाणी के पूर्व अपर महानिदेशक गुलाब चंद जी के पास उनकी स्मृतियों का अगाध भंडार है।उन्होनें मोती बी.ए.का एक मोहक चित्र आकाशवाणी लखनऊ के सभागार में सम्मानपूर्वक स्थापित कराया है । ऐसे शलाका पुरुष को उनकी 97वें जन्मदिवस पर प्रसार भारती परिवार का नमन !

ब्लाग रिपोर्टर :-  श्री. प्रफुल्ल कुमार त्रिपाठी,लखनऊ;मोबाइल नं0 9839229128   
darshgrandpa@gmail.com

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