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Wednesday, November 23, 2016

Inspiration-खतरों और हौसलों की कहानी है अरुणिमा सिन्‍हा


कहते हैं हवा के अनुकूल चलने वाला जहाज कभी बन्दरगाह नहीं पहुंचता। प्रतिकूल परिस्थितियों में जो अपने लक्ष्य से विचलित नही होता सफलता उसके कदम चूमती है। कृत्रिम पैर के सहारे हिमालय की सबसे ऊॅंची चोटी 'माउंट एवरेस्ट' फतह कर उत्तर प्रदेश के अम्बेडकरनगर का नाम रोशन करने वाली अरुणिमा सिन्हा कहती हैं, मेरा कटा पांव मेरी कमजोरी था। उसे मैने अपनी ताकत बनाया। बास्केट बॉल खिलाड़ी अरुणिमा को 11 अप्रैल 2011 की वह काली रात आज भी याद आती है, जब पद्मावत एक्सप्रेस से वह दिल्ली जा रही थीं। बरेली के पास कुछ अज्ञात बदमाशों ने उनके डिब्बे में प्रवेश किया। अरुणिमा को अकेला पाकर वे उनकी चेन छीनने लगे। छीना-झपटी के बीच बदमाशों ने उन्हें ट्रेन से नीचे फेक दिया। जिससे उनका बांया पैर कट गया। लगभग सात घण्टों तक वे बेहोशी की हालत में तड़पती रहीं। इस दौरान दर्जनों ट्रेने गुज़र गईं।

सुबह टहलने निकले कुछ लोगों ने जब पटरी के किनारे अरुणिमा को बेहोशी की हालत में पाया तो तुरंत अस्पताल पहुंचाया। जब मीडिया सक्रिय हुआ तो अरुणिमा को दिल्‍ली के एम्‍स में भर्ती कराया गया। एम्स में इलाज के दौरान उनका बाया पैर काट दिया गया। तब लगा बास्‍केट बॉल की राष्‍ट्रीय स्‍तर की खिलाड़ी अरुणिमा अब जीवन में कुछ नहीं कर पायेगी। लेकिन उन्होंने जि़न्दगी से हार नहीं मानी। अरुणिमा की आंखों से आंसू निकले, लेकिन उन आंसुओं ने उन्‍हें कमजोर करने के बजाये साहस प्रदान किया और देखते ही देखते अरुणिमा ने दुनिया के सबसे ऊंचे शिखर माउंट एवरेस्‍ट पर चढ़ने की ठान ली। अरुणिमा ने ट्रेन पकड़ी और सीधे जमशेदपुर पहुंच गईं। वहां उन्‍होंने एवरेस्ट फतह कर चुकी बछंद्री पाल से मुलाकात की। फिर तो मानो उनके पर से लग गये। प्रशिक्षण पूरा करने के बाद 31 मार्च को उनका मिशन एवरेस्ट शुरु हुआ। 52 दिनों की इस चढ़ाई में 21 मई को माउंट एवरेस्ट पर तिरंगा फहराकर वे विश्व की पहली विकलांग पर्वतारोही बन गईं। अरुणिमा का कहना है विकलांगता व्यक्ति की सोच में होती है। हर किसी के जीवन में पहाड़ से ऊंची कठनाइयां आती हैं, जिस दिन वह अपनी कमजोरियों को ताकत बनाना शुरू करेगा हर ऊॅंचाई बौनी हो जायेगी। स्‍लाइडर में प्रस्‍तुत हैं अरुणिमा से खास बातचीत के कुछ अंश।

प्र. क्या परिस्थितियां थी उस समय? उ. मूलतः हम बिहार के रहने वाले थे। पिताजी फौज में थे जिस कारण हम लोग सुल्तानपुर आ गये। चार वर्ष की उम्र में पिता का स्वर्गवास हो गया। मां के साथ हम अम्बेडकरनगर पहुंचे वहां उन्हें स्वास्थ्य विभाग में नौकरी मिल गई। पर परिवार को चलाना अब भी मुश्किल था। फिर भी इण्टर के बाद एलएलबी की पढ़ाई की। खेलों में रुझान होने के कारण राष्ट्रीय स्तर पर वॉलीबाल व फुटबाल में कई पुरूस्कार जीते, लेकिन कुछ खास हाथ न लग सका। पर मेरा एक सपना था कुछ अलग करने का।प्र. वह भयानक ट्रेन हादसा याद आता है? उ. वह रात मैं सारी उम्र नही भूल सकती। मैं दिल्ली जा रही थी। रात के लगभग दो बजे थे। चारों ओर सन्नाटा था कब मेरी आंख लगी कुछ पता न चला। तभी बरेली के पास कुछ बदमाश गाड़ी पर चढ़े। अकेला जान वे मेरी चेन छीनने लगे मैने भी डटकर उनका सामना किया। झपटा-झपटी के बीच उन लोगों ने मुझे ट्रेन से नीचे फेक दिया। जिससे मेरा बांया पैर कट गया।

प्र. बछेन्द्रीपाल से आपने ट्रेनिंग ली, कैसे पहुंची उन तक? उ. एम्स में इलाज के दौरान ही मैने बछेन्द्रीपाल जी का मोबाइल न. इण्टरनेट से प्राप्त किया। उनसे मैने अपनी पूरी कहानी बतायी और कहा मैं एवरेस्ट पर चढ़ना चाहती हूं। उन्होंने मुझे जमशेदपुर बुलाया। फिर क्या था अगले ही पल मैं वहा थी। दो वर्ष तक मैने उनसे ट्रेनिंग ली।
प्र. हिमालय की चढ़ाई के दौरान कैसी चुनौतियां थीं? उ. 52 दिनों की यात्रा हर पल रोमांच खतरों और हौसलों की कहानी से भरी थी सबसे मुश्किल छड़ डेथ जोन एरिया खंबू आइसलैण्ड के थे। बर्फ की चट्टानों पर चढ़ाई करनी थी। सिर पर चमकता सूरज था। कब कौन सी चट्टान पिघलकर गिर जाए, अंदाजा लगाना मुश्किल था।
प्र. माउंट एवरेस्‍ट पर लाशें देख कैसा लगा? उ. जब मैं माउंट एवरेस्‍ट पर चढ़ रही थी तभी पहले उसे पार करने की कवायद कर चुके आधा दर्जन से ज्यादा पर्वतारोहियों की सामने पड़ी लाशें रोंगटे खड़ी कर देती थीं। कभी बर्फ उन्हें ढक देती कभी हवा के झोके उन पर ढ़की बर्फ हटा देते। ऐसे मंजर का सामना मुश्किल था, लेकिन नामुमकिन नहीं।प्र. सब कह रहे थे वापस आ जाओ, फिर क्‍या हुआ? उ. पर्वत पर चुनौतियों का सामना करना बहुत मुश्किल था। पर धैर्य नही खोया। इसी बीच मेरा आक्सीजन सिलेण्डर खत्म हो गया था। कैम्प से मेरे पास फोन आ रहे थे अरुणिमा तुम वापस आ जाओ जहां तक तुम पहुंची हो वो भी एक रिकार्ड है। पर मैने तो मन्जिल को पाने की ठानी थी बीच में कैसे आ जाती।

प्र. युवाओं को आप क्या संदेश देना चाहेंगी? उ. मैं बस इतना कहना चाहती हूं कि परिस्थितियां बदलती रहती हैं। पर हमे अपने लक्ष्य से भटकता नही चाहिये बल्कि उनका सामना करना चाहिये। जब मैं हॉकी स्टिक लेकर खेलने जाती तो मोहल्ले के लोग मुझ पर हसते थे मेरा मज़ाक उड़ाते थे। शादी हुई और फिर तलाक पर मैंने हार न मानी। बड़ी बहन व मेरी मां ने मेरा साथ दिया। हादसे के बाद मेरे जख्मों को कुरेदने वाले बहुत थे पर मरहम लगाने वाले बहुत कम। इतना कुछ होने के बाद मैने अपने लक्ष्य को पाने के लिए पूरा जोर लगा दिया। अन्ततः मुझे सफलता मिली।

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