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Wednesday, December 7, 2016

‘तबला तो मेरे प्राण हैं, मैं इसके बिना नहीं रह सकता’--ग्वालियर की माटी में जन्मे जाने -माने तबला वादक रामस्वरूप रतौनिया

ग्वालियर| तबला तो मेरे प्राण हैं, मैं इसके बिना नहीं रह सकता। यह बोल हैं, ग्वालियर की माटी में जन्मे जाने -माने तबला वादक रामस्वरूप रतौनिया के, जो उन्होंने बीते सितंबर माह में यहां गंगादास की शाला में आयोजित कार्यक्रम में अपनी एकल प्रस्तुति के बाद शहर के ही युवा तबला वादक आैर शोधार्थी विकास विपट के साथ बातचीत में कहे थे। 

ग्वालियर के तबला वादकों की परंपरा का ऐतिहासिक एवं सांगीतिक विश्लेषण विष? पर शोध कर रहे विकास, अपने शोध के सिलसिले में उनसे एक इंटरव्यू करने पहुंचे थे। मिलते ही उन्होंने कहा था- इंटरव्यू छोड़ो, ये बताआे, तबला कैसा बजा? जाने-माने शायर आैर आकाशवाणी ग्वालियर में पदस्थ मदन मोहन मिश्रा दानिश यहां केंद्र निदेशक के रूप में गुजरे कार्यकाल की यादें ताजा करते हुए कहते हैं- ऑफिस में लंच टाइम होते ही रतौनिया जी स्टूडियो में स्टाफ कलाकारों के साथ जाकर बैठ जाते थे। कभी आधा घंटा तो कभी पौन घंटा रियाज चलता था। वे कहते थे- मैं रियाज के बिना नहीं रह सकता। ऑफिस की मीटिंग के सिलसिले में हम लोगों का अक्सर शहर के बाहर जाना होता था। उस दौरान भी वे मीटिंग से फुरसत मिलते ही अपने कलाकार मित्रों को बुलाकर रियाज करने बैठ जाते थे। कभी-कभी अकेले भी। रियाज उनके लिए सुबह-शाम की जाने वाली पूजा की तरह था। वे जितने अच्छे प्रशासक थे, उतने ही अच्छे कलाकार आैर एक इनसान भी। उनमें सहजता, सरलता आैर निपुणता कमाल की थी। कलाकार सीनियर हो या जूनियर, मंच पर संगत करते समय उन्होंने सदैव यह ख्याल रखा कि उनके तबले के आगे कहीं उनका हुनर दब न जाए। वे नवाचार को भी महत्व देते थे। ग्वालियर आकाशवाणी केंद्र में आकाश गंगा के नाम से लगी ग्वालियर घराने के संगीतकारों के चित्रों की वीथिका, इसका उदाहरण है आैर एक महत्वपूर्ण धरोहर भी। आज वे हमारे बीच नहीं रहे। यह हमारी आैर भारतीय शास्त्रीय संगीत की अपूरणीय क्षति है। 

Forwarded By:Jainender Nigam,PB NewsDesk ,prasarbharati.newsdesk@gmail.com

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