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Sunday, June 11, 2017

मैं अमीन सयानी बोल रहा हूं


83 साल की इस उम्र में ‘गीतमाला की छांव में’ के आखिरी वॉल्यूम की मांग से बेहद खुश हूं। असल में मैं और गीतमाला एक ही सिक्के के दो रूप हैं। संगीत की दुनिया में गीतमाला हमेशा छायी रहेगी।
मेरी आवाज 
ढेरों एड फिल्मों, जिंगल्स और रेडियो प्रोग्राम में मैंने अपनी आवाज दी है, पर ना जाने क्यों मेरी आवाज की हर चर्चा अंततः गीतमाला के इर्द-गिर्द सिमट कर रह जाती है। शायद यही वजह है कि मैंने गीतमाला की यादों को एलबम के तौर पर समेटने की कोशिश की है। इस एलबम का एक के बाद एक वॉल्यूम जारी करते हुए मुझे एक खास सुकून मिला है। संगीत के उस सुरीले दौर को आज की युवा पीढ़ी के साथ शेयर करने में मुझे काफी मजा आया। अब मुझसे मेरे युवा दोस्त पूछते हैं कि आज के गानों में वो सुरीलापन क्यों नहीं मिलता। मेरा एक ही जवाब होता है, आज के गाने मन के लिए नहीं तन के लिए होते हैं। सीधी सी बात है, इन गानों को सुनिए और इनके शोर मचाने वाले रिदम पर खूब व्यायाम कीजिए।
बिनाका गीतमाला 
1952 में रेडियो सिलोन से फिल्म संगीत का यह कार्यक्रम शुरु हुआ था। तब ऑल इंडिया रेडियो से फिल्म संगीत की बात सोची भी नहीं जा सकती थी। पर इस कार्यक्रम ने रेडियो सिलोन को जो लोकप्रियता दिलायी, उसके बाद ऑल इंडिया रेडियो वालों ने भी फिल्म संगीत में रुचि लेना शुरु कर दिया। हर बुधवार की रात आठ बजे आने वाले बिनाका गीतमाला की लोकप्रियता के बारे में नये सिरे से कोई चर्चा करना बेमानी है। मेरा श्रोताओं को ‘बहनों और भाइयों’ संबोधित करना आज भी आवाज की दुनिया में याद किया जाता है। इस हिंदुस्तानी फिल्म संगीत के कार्यक्रम को सुनकर ढेरों लोगों ने हिंदुस्तानी भाषा के मर्म को समझा था। सन 1950 से संगीत के शानदार सुरीले दौर की शुरुआत हो गयी थी। यों तो आजादी के पहले से कर्णप्रियता की एक लहर बहनी शुरु हो गयी थी, लेकिन 1950 के बाद इसने सही मायने में एक रफ्तार ले ली थी। किन-किन बातों का जिक्र करूं, उस दौर के ज्यादातर संगीतकारों ने इसमें अपना नायाब योगदान दिया था।
संगीत का बहुत योगदान 
मैंने सभी के उम्दा काम को इस एलबम में रखा है। यही नहीं जब तक उम्र साथ देती रहेगी, मैं इस तरह के एलबम पर काम करता रहूंगा। अब मेरा इरादा इस ‘गीतमाला’ के और भी कुछ खंड निकालने का है। वैसे भी उस दौर के संगीत को सिर्फ चंद सीडी में समेटना नामुमकिन है। मैं उस दौर के संगीत की तुलना इस नये दौर के संगीत के साथ करना बिल्कुल बेमानी मानता हूं। संगीत तो एक अविरल धारा है, जो बहती रहती है। इस बहाव में उसके रास्ते में जो भी आता है, वो उसे अपने आप में समेट लेती है। यह संगीत कितना कर्णप्रिय है, यह तो श्रोता ही तय करेंगे। मुझे तो इस बात का ताज्जुब होता है कि आज की हिट फिल्मों में ऐसी ढूंढनी पड़ती हैं, जिनकी सफलता में उनके संगीत का अहम हाथ हो। जबकि पुराने दौर में फिल्म को हिट बनाने में उसके संगीत का बहुत योगदान होता था।
आज के रेडियो जॉकी 
आज मुझे इस बात की शिकायत है कि ज्यादातर रेडियो जॉकी इस बात को भूल गये हैं कि उन्हें कहां चुप रहना और कहां बोलना चाहिए। किसी बड़े दिग्गज की बात को रोक कर वो अपनी बात रखने लगते हैं। ‘गीतमाला’ के गीतों के साथ उस दौर के संगीतकारों, निर्देशकों और कलाकारों का कमेंट भी होता था, जिनमें से कई आज हमारे बीच मौजूद नहीं हैं। मैंने इस पूरे गीतमाला का एक छोटा सा ऑडियाें विजुअल भी तैयार किया था। यह एलबम उन फिल्मी हस्तियों को मेरी एक विनम्र श्रद्धांजलि है, जो आज हमारे बीच नहीं हैं। जहां तक संगीत रसिकों का सवाल है, यह संगीत के सुनहरे दौर का एक संग्रहणीय दस्तावेज बन सकता है।

स्त्रोत :- http://dainiktribuneonline.com/2016/06 और श्री. झावेंद्र कुमार ध्रुव के फेसबुक अकाउंट से

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