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Thursday, August 9, 2018

मित्रता दिवस पर विशेष

पटना दूरदर्शन से अवकाश प्राप्त कार्यक्रम अधिशासी और रचनाकार अजयकांत शर्मा का पटना से गहरा लगाव था। कैंसर से लंबी लड़ाई के बाद 31 जुलाई को उनका निधन हो गया। दूरदर्शन के कार्यक्रम अधिशासी शंभू पी. सिंह मित्रता दिवस पर अपने दिवंगत मित्र की जिंदगी के कुछ पन्नों को पलट रहे हैं।

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बात फरवरी 1984 की है, जब मैंने दूरदर्शन मुजफ्फरपुर से सरकारी सेवा की शुरुआत की। तब बिहार में दूरदर्शन केंद्र सिर्फ मुजफ्फरपुर में ही था। टीवी स्टेशन की कार्य प्रणाली का मुझे कोई ज्ञान नहीं था। वहीं अजयकांत शर्मा से मुलाकात हुई। मैं, सिर्फ पता करने गया था कि एसएससी से चयन के बाद कुछ जानकारी केंद्र द्वारा मांगी गई थी उसका क्या हुआ। केंद्राध्यक्ष ने मेरी ज्वाइनिंग करा दी। मैं असमंजस में था कि क्या करूं। अजय जी से मैने यह बात शेयर की। उन्होंने कहा कि यदि आपने महावीर प्रसाद द्विवेदी की ‘आत्मकथा’ निबंध को पढ़ा हो और उसकी एक पंक्ति की व्याख्या की हो। ‘जो निश्चित को छोड़ अनिश्चित की ओर जाता है उसका अनिश्चित तो अनिश्चित ही है,निश्चित भी अनिश्चित हो जाता है’। तो अब आप निर्णय कर सकते हैं। उनके उसी एक वाक्य के दुहराए जाने से आजतक मैं खड़ा हूं।

अजय जी का पटना से बहुत लगाव था। उसके दो कारण थे। एक तो आनन्दपुर,विक्रम के रहनेवाले और दूसरा आकाशवाणी से जुड़ा होना। 1982 में दूरदर्शन ज्वाइन करने से पहले 1980 से वो एक उद्‌घोषक के रूप में ‘युववाणी’से जुड़े थे।

अजय जी के साथ एक ही अनुभाग में कार्य करने के अनुभव को साझा करते हुए तब की आकस्मिक उद‌्घोषिका रत्ना पुरकायस्थ कहती हैं-
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‘अजय जी बहुत ही मिलनसार व्यक्ति थे।’ युववाणी से ही दोनों ने कॅरियर की शुरुआत की थी। वह जो भी करते पूरे मनोयोग से करते थे। आवाज के धनी अजयकांत जी को आकाशवाणी जीवन पर्यन्त आकर्षित करता रहा।

तब के उर्दू उद‌्घोषक कासिम खुर्शीद कहते हैं- 
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‘अजय जी ने कभी अपनी रचनात्मकता के साथ समझौता नहीं किया। दोस्ती और अपने काम से वो बहुत मोहब्बत करते थे।’ मुझे याद नहीं कि कभी कोई रचनात्मक बैठकी उनके बिना हो पाई हो।”। टीवी में लगभग 33 बर्षों के कार्यकाल में रांची,बरेली के बाद सबसे अधिक समय पटना दूरदर्शन में बीता और जहां तक मुझे याद है यहीं पर उन्होंने ढेर सारे नाटक और टेलीफिल्म और सीरियल का निर्माण किया। दूरदर्शन रांची और पटना में इस विधा मे कार्यक्रम के निर्माण की एक लंबी लकीर उन्होंने खींच दी थी। मृदुभाषी और यस बॉस के गुणों के कारण वे हर अधिकारी के करीब रहे। ईगो और अधिकारी का रौब तो उन्हें छू ही नहीं पाया। थोड़े भावुक किस्म के इंसान थे। कभी-कभी भावुकतावश अपने को ठगा सा भी महसूस करते। किसने कहां धोखा दिया,किसने चूना लगाया,किसने चीटिंग की, जैसे आत्ममंथन कर रहे होते तो मैं उबल पड़ता कि आप रियेक्ट क्यों नहीं करते हैं, तो वो मुस्कुराकर कहते क्या रियेक्ट करना है,स्थायी कुछ थोड़े ही है,चलिए कुछ(?)लेते हैं, और फिर ढेर सारी बातें होती,घर और दफ्तर की बात

किसी से गिला कोई शिकवा

कभी किसी से कोई गिला कोई शिकवा। कभी-कभी मैं झुंंझला जाता तो कहते, आपकी एक कविता की ही पहली पंक्ति है ‘तूूफान समुद्र के किसी भी हिस्से में आए,तबाही तो किनारे की ही होनी है।’मैं ही किनारा हूं अपने घर और दफ्तर का। जो नागार्जुन के उपन्यास ‘बलचनमा’ धारावाहिक की प्रस्तुति प्रक्रिया के दौरान 2015 के मई माह में कैंसर के रूप में सामने आया।

बलचनमा धारावाहिक के निर्माण के दौरान के अपने अनुभव को साझा करते हुए दूरदर्शन पटना के केंद्र निदेशक पुरुषोत्तम एन सिंह कहते हैं-
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”शर्मा जी ने काम के दौरान कभी एहसास नहीं होने दिया कि उन्हें कोई तकलीफ है। बाद में पूछा तो कहने लगे-सोचा पहले इस काम को खत्म कर लूं फिर जांच कराएंगे। जांच हुई तबतक कैंसर ने जकड़ लिया था। कैंसर से लड़ना उन्होंने जारी रखा। मुंबई और पटना में इलाज के बाद थोड़ा सामान्य होते ही फिर वही पुराना अंदाजेबयां उनकी जीवंतता का प्रमाण था। लगा उन्होंने कैंसर को मात दे दी थी। मृत्यु से दो दिन पूर्व मुझे बुलाया गया। एक प्राइवेट हॉस्पिटल के आई सी यू बेड पर पड़े कुछ बोलना चाह रहे थे। बेटे को इशारे से उन्होंने कहा- ‘इनसे मुझे बात करने दो’,इशारा मेरी ओर था। मैं थोड़ा झुका तो आवाज आई “मुझे यहां से ले चलिए मैं अपने परिवार के बीच मरना चाहता हूं।’ मैने उन्हें एश्योर किया। रात तक वो घर पहुंच चुके थे,सुबह मैने बात की तो घर मंे अपने लोगों के बीच काफी सुकून महसूस कर रहे थे। मुझे नहीं पता था कि ये मेरी आखरी बातचीत साबित होगी। इस बातचीत को अभी चौबीस घंटे भी नहीं गुजरा था,सुबह पांच बजे मेरे मोबाइल की घंटी बजी। जो अंदेशा था वही हुआ। हम सभी से काफी दूर चले गए। 06 नबंवर 1955 से 31 जुलाई 2017 के सफर का अंत हो चुका था। मित्र आपकी ईमानदारी पर हमें कल भी नाज़ था और आज भी नाज़ है। आप हमेंशा साथ रहेंगे।

सीनियर से ज्यादा एक मित्र के रूप में पेश आते थे अजय कांत शर्मा


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