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Wednesday, December 30, 2015

श्रीमती उदिता जैन, प्र. स. निदेशक(राजभाषा) गुवाहाटी से सेवा निवृत्त हो रहीं हैं

श्रीमती उदिता जैन, प्रभारी सहायक निदेशक(राजभाषा) दिनांक 31/12/2015 को अपर महानिदेशक(अभि)(उत्तर पूर्व क्षेत्र) का कार्यालय, आकाशवाणी एवं दूरदर्शन, गुवाहाटी से सेवा निवृत्त हो रहीं हैं । श्रीमती जैन की नियुक्ति जुलाई, 1989 को आकाशवाणी, गुवाहाटी में हिन्दी अनुवादक के पद पर हुई । आकाशवाणी, गुवाहाटी में उन्होंने राजभाषा संबंधी कार्यों का शुभारंभ किया और राजभाषा कार्यान्वयन की दिशा में कई महत्वपूर्ण कार्य किए । आकाशवाणी, गुवाहाटी के अतिरिक्त उन्होंने आकाशवाणी, बेंगलूर में भी अपनी सेवाएं प्रदान की हैं ।

सन् 2005 से 2011 तक आकाशवाणी, बेंगलूर में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने आकाशवाणी, बेंगलूर को राजभाषा कार्यान्वयन को एक नवीन दिशा प्रदान की । क्षेत्रीय राजभाषा कार्यान्वयन समन्वय समिति का गठन कर कर्नाटक के सभी आकाशवाणी केन्द्रों को एक मंच पर उपस्थित कर राजभाषा नीति एवं कार्यान्वयन की जानकरी देने का प्रयास किया तथा कई संयुक्त हिन्दी कार्यशालाओं का भी आयोजन किया । कार्यालय में हिन्दी में कामकाज को सुगम बनाने के लिए इनके संपादन में “समन्वय” नामक एक कार्यालय सहायिका भी प्रकाशित की गयी ।

श्रीमती जैन ने राजभाषा कार्यों के अतिरिक्त आकाशवाणी गुवाहाटी में हिन्दी कार्यक्रमों के प्रसारण में भी अपना बहुमूल्य योगदान दिया है । उन्होंने आकाशवाणी एवं दूरदर्शन के अनेकों आलेखों, नाटकों, कहानियों, वृत्त चित्रों आदि का असमीया तथा अंग्रेजी से हिन्दी में रूपांतरण कर हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार में योगदान देने के साथ ही पूर्वोत्तर की सभ्यता संस्कृति को देश के अन्य भागों में विस्तार करने का भी प्रयत्न किया ।
उनकी सेवा निवृत्ति के अवसर पर प्रसार भारती उनके बहुमूल्य अवदानों एवं सेवाओं के प्रति आभारी है । श्रीमती उदिता जैन की राजभाषा के प्रति निष्ठा, अनुराग तथा समर्पण की भावना से किए गए कार्य राजभाषा कर्मियों एवं हिन्दी के प्रचार-प्रसार से जुड़े व्यक्तियों को हमेशा प्रेरणा एवं नवीन ऊर्जा प्रदान करते रहेंगे ।
उनके इस योगदान के लिए आकाशवाणी महानिदेशालय द्वारा उन्हें तीन बार अखिल आकाशवाणी राजभाषा सम्मान से पुरस्कृत किया तथा सन् 2013 में अपर महानिदेशक(अभि) का कार्यालय, गुवाहाटी को राजभाषा संबंधी उत्कृष्ट कार्य के लिए अखिल आकाशवाणी पुरस्कार भी प्रदान किया । केन्द्रीय अनुवाद ब्यूरो, बेंगलूर से उन्होंने सन् 2007 में त्रैमासिक अनुवाद प्रशिक्षण ग्रहण किया तथा उन्हें स्वर्ण पदक के साथ उत्कृष्ट प्रमाण-पत्र भी प्रदान किया गया ।

अपर महानिदेशक(अभि) (उत्र पूर्व क्षेत्र) का कार्यालय, आकाशवाणी एवं दूरदर्शन, गुवाहाटी में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने कार्यालय के सभी कर्मचारियों को हिन्दी में काम करने की प्रेरणा दी तथा उनकी रचनात्मक कुशलता को एक मंच प्रदान करने हेतु सन् 2014 तथा 2015 में “नीलांचल” नामक हिन्दी पत्रिका भी प्रकाशित की । उनके कुशल संपादन, मार्गदर्शन और प्रेरणा के जरिए यह कार्यालय राजभाषा की दिशा में कुछ कदम और अग्रसित करने में सक्षम हो पाया, यह हमारे लिए गौरव की बात है ।आज उनकी सेवा निवृत्ति के दिन इस संस्था को प्रदान की गयी उनकी सेवाओं के प्रति कार्यालय का हर सदस्य अपना आभार व्यक्त करता है तथा अपना कार्यालयीन कार्यकाल संपूर्ण करने पर बधाई देते हुए उनके सुखद एवं स्वस्थ जीवन की कामना करता है ।

प्रसार भारती परिवार उनको इस निवृत्ति पश्चात जीवन के लिए हार्दिक शुभकामनाए देती है ।

ब्लॉग योगदान :दशरथ सरकार ,dasharath_sarkar48@rediffmail.com

अगर कोई अपने ऑफिस से निवृत्त होने वाले कर्मचारी के बारे में कोई जानकारी ब्लॉग को भेजना चाहते है तो आप जानकारी pbparivar @gmail .com पर भेज सकते है

2 comments:

  1. धन्यवाद दशरथ जी । आप लोगों के हिन्दी के प्रति इतने प्यार और सम्मान की खातिर ही मैं अपने काम में सफल हो पायी हूँ । आशा है इस ज्योति को आप सब हमेशा जलाए रखेंगे ।

    उदिता जैन

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  2. जो हिन्दी में करे काम और जो हिन्दी का करे काम
    उस हिन्दी प्रेमी को, इस हिन्दी प्रेमी का सैकडों सलाम

    आकाशवाणी, विशाखापट्टणम के ओर से और मेरी ओर से भी महोदया उदिता जैनजी, आप को ये संदेश । आप की कर्मभूमि से छब्बीस साल के लंबी अवधि हिन्दीसेवा करने के बाद सेवा निवृत्ती लेना भले ही आपको एक उपलब्धी महसूस हो, पर आप माने या न माने, हमें तो इसका खटका जरूर रहेगा । आज हिन्दी के प्रति प्रेम अगर हमारे कार्यालयों में दृष्टिगोचर हो रही है, तो इस का सारा श्रेय हिन्दी अनुभाग के अधिकारियों को ही मिलना चाहिए । फिर आप तो, जैसा ब्ल़ॉग में कहा गया है, हिन्दी के प्रति अति उत्सुक हैं । जिसका परिचय आपको मिले सम्मानों से जाहिर होता है । अगर मैं गलत न हूं तो, गुवाहाटी के नीलाचंल गृह पत्रिका के कुछ अंक मैं ने भी पढे हैं । और उनमें से ही अति छोटी कहानी जो एक गरीब परिवार के बच्ची का एक्सीडेंट में बच जाने पर उस को कोई मुवायजा नहीं मिलता । तब उसकी मां, कलमुँही तू जिंदा बच के क्यों फिर खाने आ गई, मर जाती तो हमें कुछ मिलता न, कहती है । हम में भी थोडी बहुत हिन्दी प्रेम बाकी है । सो हम आपको अलविदा नहीं कहेंगें, अपितु हम तो अब आप से और ज्यादा की आस रखेंगें ।
    हम करते जितना हिन्दी से प्यार
    और भी करे तो बात कुछ बने सरकार

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