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Monday, June 22, 2020

भारत-चीन 1962 युद्ध के दौरान बढ़ गई थी रेडियो की डिमांड, डाकघर में कराना होता था पंजीकरण - न्यूज़ रिपोर्ट


आज की तरह 1962 में संचार के संसाधन नहीं थे। घटनाओं की तुरंत जानकारी कई दिनों बाद मिल पाती थी। देश दुनिया की जानकारी शहरियों व ग्रामीणों को रेडियो से हुआ करती थी। 1962 में भारत-चीन युद्ध के हालात जानने के लिए हर कोई परेशान रहता था। वहां क्या हो रहा है। देश के सैनिक कैसे चीनी सैनिकों का मुकाबला कर रहे हैं। वहां के हालात क्या हैं। इस युद्ध का हाल जानने के लिए रेडियो की डिमांड बढ़ गई थी। शहर में रेडियो की दो गिनी-चुनी दुकानें थीं। जहां रेडियो एक सप्ताह के भीतर रेडियो का स्टाक खत्म हो गया था। 15 दिन तक लोगों को रेडियो खरीदने का इंतजार करना पड़ा था। गांव में रेडियो रखने वाले के घर समाचार सुनने के लिए लोगों की भीड़ जुटती थी। रेडियो व रेडुआ की कीमत 50 से लेकर 150 रुपये हुआ करती थी।
भारत-चीन युद्ध के दौरान सेना में जिले के भी सैकड़ों सैनिक सरहदों पर तैनात थे। देश दुनिया में होने वाली गतिविधियों के साथ ही भारत-चाइना युद्ध का हाल जानने के लिए लोग रेडियो पर समाचार सुना करते थे। व्यापारी राजेंद्र अग्रवाल के अनुसार शहर में 1962 के दौरान रेडियो की केवल दो दुकानें हुआ करती थी। निर्मल तिराहे पर सेठ धर्मदेव अग्रवाल की तो दूसरी पंजाबी मार्केट में जाफरी की। सेठ धर्मदेव की दुकान पर मरफी तो अहमद सुहैल जाफरी की दुकान पर फिलिप्स कंपनी का रेडियो व रेडुआ मिलता था। राजेंद्र अग्रवाल उर्फ राजू ने बताया कि उस समय रेडियो व रेडुआ 50 से लेकर 150 रुपये के बीच बिकता था। जिसे लेने के लिए गांव से चार पांच लोग आया करते थे।रेडियो खरीदने के बाद तीन रसीद कटती थी। एक रसीद स्टेशन रोड स्थित डाकघर जाती थी। जहां रेडियो का पंजीकरण होता था। बिना पंजीकरण के रेडियो का प्रयोग पूरी तरह वर्जित था।
युद्ध का हाल जानने के लिए लोग रेडियो खरीद रहे थे। एक सप्ताह में ही स्टाक समाप्त हो गया था। पंद्रह दिन बाद रेडियो का स्टाक आने पर लोगों की भीड़ लग गई। चूंकि बिना पंजीकरण के बिक्री मना थी। इसलिए लोगों को रेडियो लेने के लिए कई दिनों तक चक्कर लगाना पड़ता रहा। 
रेडियो को घुमा-घुमाकर पकड़ाते थे सिग्नल
रानीगंज तहसील क्षेत्र के भटपुरवा निवासी राजेंद्र मिश्र बताते हैं कि भारत-चीन युद्ध के हालात जानने के लिए दो चार गांव के लोग एक जगह एकत्र होते थे। अममून चौपाल वाले स्थानों पर ही लोग रेडियो लेकर पहुंच जाते थे। जहां समाचार प्रारंभ होने के पहले से ही रेडियो को घुमाकर सिग्नल पकड़ाया जाता था। बीच में रेडियो रखा जाता था।
युद्ध का हाल जानने को जुटते थे ग्रामीण
बेलखरनाथ धाम विकासखंड के ओझला निवासी बृजेश बहादुर सिंह यूपी पुलिस से सेवानिवृत्त हैं। 95 वर्षीय बृजेश सिंह बताते हैं कि भारत-चाइना युद्ध के दौरान बरगद के पेड़ के नीचे युवक शाम को अलाव की लकड़ी एकत्र कर देते थे। शाम होते ही रात आठ बजे समाचार की बुलेटिन सुनने के लोग बहुत से लोग आ जाते थे। समाचार सुनने के दौरान सन्नाटा पसर जाता था। वह बताते हैं कि जब समाचार सुनते हुए यह पता चलता था कि देश का सैनिक शहीद हुआ है तो लोगों की आंखों से आंसू निकल आते थे और लोग जोश में आ जाते थे। जैसे ही समाचार का बुलेटिन समाप्त होता। जोश से लबरेज लोग सीमा पर जाकर जंग लडने की बातें करने लगते थे। तीन समय बुलेटिन सुनने के लिए लोग बरगदहा बाबा के घर के सामने स्थित बरगद के पेड़ के नीचे जुटते थे।

स्रोत और श्रेय :- https://www-amarujala-com.cdn.ampproject.org/
द्वारा अग्रेषित :- श्री. श्री. झावेंद्र कुमार ध्रुव
jhavendra.dhruw@gmail.com  

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