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Thursday, August 20, 2020

आकाशवाणी गोरखपुर को याद है पं. जसराज के सुरोंसे भरी संगीतमय शाम। ।


पंडित जसराज के शास्त्रीय गायन से दो बार सजी थी गोरखपुर की शाम और वे आकाशवाणी के भी बने थे मेहमान साठ और नब्बे के दशक में पंडित जसराज के शास्त्रीय सुर गोरखपुर की फिजाओं में भी महके थे। सोमवार को जब मेवाती घराने की पहचान और देश के शास्त्रीय गायन की शान पद्म विभूषण पंडित जसराज के निधन की खबर आयी तो शहर के संगीत प्रेमियों के बीच शोक की लहर दौड़ गई।पंडित जसराज के नाम गोरखपुर में दो अहम और यादगार संगीत की शाम जुड़ी हुई हैं। 1960 में पंडित जसराज पहली बार गोरखपुर के मेहमान बने थे। पूर्वोत्तर रेलवे के तीन दिवसीय संगीत सम्मेलन की एक शाम पंडित जसराज के नाम थी। रेलवे स्टेडियम में यादगार शाम सजी थी। उनके साथ तानपुरे पर संगत करने के लिए गोरखपुर के दो युवा पंडित शरद मणि त्रिपाठी और विपिन बिहारी शुक्ल थे।पं. शरद मणि ने उस आयोजन को याद करते हुए बताया कि, ‘पंडित जसराज के साथ संगत करने को लेकर थोड़ा संकोच था। लेकिन पंडित जसराज ने कार्यक्रम से पहले ही माहौल हल्का कर दिया और आत्मविश्वास जगा दिया। हम लोगों के साथ कार्यक्रम से पहले ग्रीन रूम में आधे घंटे तक तानपुरे की ट्यूनिग किये मंच पर पहुंचे तो ठण्डी हवा के झोके ने तानपुरे की सारी ट्यूनिंग बिगाड़ दी क्योंकि हवा से तानपुरे के तारों पर असर पड़ता है। हालांकि वो आधा घंटा भी हजारों दर्शकों ने सिर्फ पंडित जसराज को देखते-देखते ही गुजार दिया। इसके बाद पंडित जी ने राग दरबारी कान्हड़ा की प्रस्तुति दी। जिसे लोग बस सुनते रहे।’ 

नब्बे के दशक एक बार फिर आकाशवाणी के आयोजन में पंडित जसराज का आना हुआ और यहां भी उनके साथ तानपुरे पर शरद मणि त्रिपाठी और तबले पर आकाशवाणी के प्रेम शंकर को संगत करने का अवसर मिला। उनके साथ उनकी शिष्या श्वेता झावेरी भी थीं। शरद मणि ने बताया कि आकाशवाणी में पंडित जसराज ने राग विहाग के साथ ही हवेली संगीत की विशेष रचनाओं के साथअड़ाना में माता महाकालीकी प्रसिद्ध बंदिश गोरखपुर के नाम की।

जब स्वर मंडल से दिखायी भक्ति :शरद मणि त्रिपाठी ने बताया कि प्रयोगधर्मी संगीतकार पंडित जसराज भगवान कृष्ण के भक्त होने के साथ ही संगीत की भक्ति करते थे। प्रस्तुति से पहले अपना स्वर मंडल खोल कर नमन करते थे। बड़े-बड़े सूफी, संतों से मिले मोती, माला को एक छोटे सी संदूक में रखते थे और प्रस्तुति से पहले उन्हें अपने माथे से लगाते थे। शरद मणि ने बताया कि आकाशवाणी में प्रस्तुति के बाद वह मेरे पिता और वयोवृद्ध संगीतज्ञ पंडित राम नारायण मणि त्रिपाठीसरसरंगसे मिले। पिता ने कुछ रचनाएं पंडित जसराज को सुनायी तो पंडित जसराज ने नतमस्तक होते हुए पिता जी के पैर छूकर आशीर्वाद लिया। 

नहीं भूल सकता उनकी शाबाशी : आकाशवाणी में हुए पंडित जसराज के कार्यक्रम का संचालन उद्घोषक सर्वेश दुबे ने किया था। सर्वेश दुबे ने बताया कि हल्की सर्दी में सन् 1990 में कार्यक्रम था। एक दिन पहले ही पंडित जसराज गए थे। परम्परा के अनुरूप संचालक होने की हैसियत से उनसे मिलने गया। उन्होंने एहसास ही नहीं होने दिया कि वह इतनी बड़ी शख्सियत हैं। उन्होंने अपनी कुछ रचनाएं बताईं और कहा कि आगे माहौल पर निर्भर करेगी उनकी गायिकी। वह मंच के पीछे थे और मैंने संचालन शुरू कर दिया। जब वह मंच पर आए तो सबसे पहले मुझे गले लगा  लिएऔर उन्होंने मंच से कहा कि इसकी जुबान में सरस्वती विराजमान हैं। बेटा बहुत आगे जाओगे। उनकी ये शाबाशी आज भी मेरे कानों में गूंजती है।

स्त्रोत-हिन्दुस्तान(गोरखपुर)

द्वारा योगदान :- प्रफुल्ल कुमार त्रिपाठी, लखनऊ।


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