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Friday, September 11, 2020

Obituary - आकाशवाणी अम्बिकापुर के लखन भइया का निधन


आकाशवाणी अंबिकापुर द्वारा ग्रामीण श्रोताओं के लिए प्रसारित सर्वाधिक लोकप्रिय कार्यक्रम चौपाल में 1984 से बतौर कंपेयर अपनी आवाज का जादू सरगुजिहा बोली में बिखेरने वाले चर्चित शख्सियत गिरवर पटेल जिन्हें रेडियो में 'लखन भइया' के नाम से लोग जानते थे, उनका निधन हो गया। अपनी बेहतरीन सरगुजिहा बोली और कृषि में जबरदस्त पकड़ रखने वाले रेडियो के लखन भैया के निधन ने लोगों को स्तब्ध कर दिया है। एक दशक पूर्व सरगुजा के गांव-गांव में सूचना और संचार का एकमात्र माध्यम रेडियो था और आज भी ग्रामीण क्षेत्र में सर्वाधिक लोगों तक रेडियो की ही पहुंच है। 
ग्रामीण इलाके में आकाशवाणी अंबिकापुर द्वारा सरगुजिहा बोली में प्रसारित चौपाल किसान वाणी कार्यक्रम सर्वाधिक लोकप्रिय कार्यक्रम है। इस कार्यक्रम में 1984 में स्वर परीक्षा देकर शामिल हुए गिरवर पटेल चार वर्ष पूर्व 60 साल की आयु पूरी करने के कारण रेडियो छोड़ चुके हैं, किंतु उनकी आवाज को सरगुजा के लोगों ने भूला नहीं है। शहर से लेकर गांव तक लोग रेडियो के लखन भइया को याद करते हैं। एक समय चौपाल कार्यक्रम में कार्यक्रम अधिशासी नागेंद्र नाथ दुबे यानि रेडियो के 'रामसाय दादा' और गिरवर पटेल 'लखन भइया' की जोड़ी के साथ सेवानिवृत्त कार्यक्रम अधिकारी कामिनी माथुर जो 'कजरी बहिन' के नाम से रेडियो में आती थी। इन तीनों की जोड़ी ने खूब धमाल मचाया था। 
सरगुजिहा बोली की मिठास और इन तीनों के चुटीले अंदाज में कार्यक्रमों का प्रस्तुतीकरण हर किसी को भाता था। पिछले कुछ दिनों से गिरवर पटेल रेडियो के लखन बीमार चल रहे थे। परिजनों ने उन्हें नागपुर अस्पताल दाखिल कराया था, जहां इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। रेडियो से जुड़े श्रोताओं तक जब लखन भइया की मौत की खबर आई तो सभी स्तब्ध रह गए। उनकी खनकती आवाज आज भी लोगों के जेहन में है। रेडियो श्रोता संघ ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी है, वही आकाशवाणी अंबिकापुर के सेवानिवृत्त अधिकारी व वरिष्ठ लेखक तपन बनर्जी, नागेंद्र नाथ दुबे सहित रेडियो से जुड़े तमाम उद्घोषक, कंपेयर और श्रोताओं ने उन्हें याद किया और श्रद्धांजलि अर्पित की। रेडियो के लखन भइया जब चौपाल के किसानवाणी कार्यक्रम की शुरुआत करते थे तब वे अक्सर सरगुजिहा बोली में कुछ न कुछ संदेश देते थे। बारिश के दिनों में अक्सर वह शाम को ठीक साढ़े सात बजे कहा करते थे 'बहिरे बरसत है पानी, लेगा सुनी किसानवाणी' हर दिन इस तरह के दो लाइन तैयार कर कार्यक्रम में बैठते थे। श्रोता भी इनके कार्यक्रम का खूब इंतजार करते थे। चौपाल के कई नए कंपेयरो को इनसे सीखने को मिला है। 
प्रसार भारती परिवार की ओर से विनम्र श्रद्धांजलि


स्त्रोत :- नई दुनिया
द्वारा अग्रेषित :- श्री झावेन्द्र कुमार ध्रुव रायपुर
jhavendra.dhruw@gmail.com

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